बर्फबारी की वजह से आदि कैलाश यात्रा मार्ग बंद
पिथौरागढ़,। सीमांत जिले पिथौरागढ़ में पिछले दिनों हुई भारी बर्फबारी के कारण धारचूला से आदि कैलाश को जाने वाली सड़क पर ढाई फुट से अधिक बर्फ जमी है। बर्फ के कारण चीन सीमा पर स्थित पिथौरागढ़ जिले के अंतिम गांव कुटी से आगे जाना संभव नहीं होता है। इसलिए शीतकाल में यहां पर आवाजाही पूरी तरह से बंद रहती है। चार दिन पूर्व हुई बर्फबारी से उच्च हिमालयी क्षेत्र के माइग्रेशन वाले गांव बर्फ से लकदक हैं। व्यास घाटी के बूंदी, गर्त्यांग, गुंजी, नपलच्यू, रांगकांग, नाबी और कुटी सात गांवों में सबसे अधिक बर्फ कुटी गांव में है। सीमांत धारचूला की दारमा घाटी का कुटी गांव 12,303 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। 26 जनवरी पर गांव गए ग्राम प्रधान नगेंद्र सिंह कुटियाल ने बताया कि गांव में लगभग डेढ़ फुट बर्फ जमा है। कुटी से आदि कैलाश सड़क पर दो फुट से अधिक बर्फ होने से वाहन या पैदल वहां जाना संभव नहीं है और आवाजाही पूरी तरह से बंद है। घाटी के दांतू, दुग्तू सहित अन्य गांवों में भी बर्फबारी हो रही है।
होम स्टे संचालक संजय जंग और गुड्डू जंग ने बताया कि मंगलवार को बर्फबारी हुई है। उन्होंने बताया कि सड़क खुली होने के कारण दिल्ली, यूपी, हिमाचल प्रदेश के अलावा पिथौरागढ़, रुद्रपुर आदि जगहों से लगभग 40 से अधिक यात्री पंचाचूली शिखर का दर्शन कर लौट आए हैं। पिथौरागढ़ के अमन जोशी, आशीष कुमार, दिल्ली के आनंद, धर्मशाला के अक्षित कुमार और यूपी के विवेक ने बर्फबारी का आनंद लेते हुए दारमा घाटी की सुंदरता का सराहना की। कुछ वर्ष पहले तक जब दारमा और व्यास घाटियां सड़क से नहीं जुड़ी थी, तब यहां के गांवों के सभी लोग अक्टूबर अंतिम सप्ताह तक अपने पशुओं के साथ निचली घाटियों की ओर आ जाते थे। दोनों घाटियों तक सड़क पहुंचने के बाद शीतकाल में भी आवागमन जारी है। कई ग्रामीणों ने होम स्टे बनाए हैं। शीतकाल में भी उनके यहां रहने से पर्यटक भी पहुंचने लगे हैं। हालांकि अधिक बर्फबारी होने पर मार्ग के कई नालों पर अस्थायी ग्लेशियर बन जाते हैं। इससे वाहन या पैदल सभी रास्ते बंद हो जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से कम बारिश व बर्फबारी के कारण अस्थायी ग्लेशियर नहीं बन रहे हैं। इससे आवाजाही हो पा रही है।
होम स्टे संचालक संजय जंग बताते हैं कि सड़क खुली होने से पर्यटकों की आवाजाही बनी है। भविष्य में यहां शीतकालीन पर्यटन भी बढ़ेगा। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में शीतकाल में सर्द हवाएं चलती हैं। बर्फबारी या सामान्य मौसम रहने पर भी रात के समय यहां का तापमान माइनस में चला जाता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में यात्रियों के रहने, खाने की व्यवस्था करना होम स्टे संचालकों के लिए आसान नहीं है।